साड़ी एवं सिल्क कपड़ों पर पारंपरिक लोककथा पेंटिंग बना,बना रही एक अलग पहचान
प्राथमिक शिक्षा अपने गांव सरडीहा से ले हिंदी साहित्य में कर रही है ग्रेजुएशन
सिमरी बख्तियारपुर (सहरसा) ब्रजेश भारती की रिपोर्ट :-
बेटा पढ़ाना फर्ज है तो बेटी में क्या हर्ज है। बेटी नहीं है बेटों से कम यह आज साबित कर रही है युवा उभरता प्रतिभावान बेटियां।
जी हां सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड के एक गांव सरडीहा यू तो इस गांव ने कालांतर से लेकर अबतक एक से बढ़कर एक प्रतिभा को जन्म दिया जो जिला स्तर से लेकर देश विदेश तक अपनी हुनर का जलवा दिखा चुका है।
इसी कड़ी में एक नया नाम जुड़ गया है प्रियंका का। मधुबनी पेंटिंग कला के जरिए पहचान बना चुकी प्रियंका साड़ी व सिल्क के कपड़ों पर अपनी कला का जलवा बिखेर रही है। प्रियंका को बचपन से ही पेंटिंग कला के प्रति लगाव था।
मिथिला शैली में पेंटिंग करने की प्रेरणा उसे अपनी बुआ मीनाक्षी सिंह से मिली। ग्रामीण परिवेश होने के बावजूद प्रियंका की प्रतिभा निखरती रही। शिक्षक मिथिलेश कुमार सिंह व प्रतिमा देवी की पुत्री प्रियंका ने स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाली प्रदर्शनियों में अपनी कला के जरिए पहचान बनाने लगी। इन प्रदर्शनियों में उसकी कला को खूब सराहना मिली। वह अपनी पेंटिंग्स में पारंपरिक लोककथा के पात्रों व स्थानों को काफी खुबसूरती से इस्तेमाल करती है।
मिथिला की परंपरागत कोहबर, राम सीता विवाह, अल्पना व अन्य लोक कला से जुड़ी पेंटिंग बनाने के बाद प्रियंका अब साड़ियों व सिल्क के कपड़ों पर भी बखूबी कलाकारी कर रही है।
फाइन आर्ट के प्रशिक्षक सिंकु आनंद व योगेन्द्र योगी के निर्देशन में मधुबनी शैली में साड़ी पर पेंटिंग करने के लिए प्रियंका छह हजार रुपये तक लेती है। स्थानीय बाजार के अलावा साड़ी पर बनायी गयी पेंटिंग की डिमांड बड़े शहरों में भी है। ग्रामीण स्तर पर प्रारम्भिक शिक्षा के बाद वह फिलहाल पत्राचार से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर कर रही है और इंटरनेट से प्रतिभा को ज्यादा विस्तार दे रही है।
प्राथमिक शिक्षा अपने गांव सरडीहा से ले हिंदी साहित्य में कर रही है ग्रेजुएशन
सिमरी बख्तियारपुर (सहरसा) ब्रजेश भारती की रिपोर्ट :-
बेटा पढ़ाना फर्ज है तो बेटी में क्या हर्ज है। बेटी नहीं है बेटों से कम यह आज साबित कर रही है युवा उभरता प्रतिभावान बेटियां।
जी हां सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड के एक गांव सरडीहा यू तो इस गांव ने कालांतर से लेकर अबतक एक से बढ़कर एक प्रतिभा को जन्म दिया जो जिला स्तर से लेकर देश विदेश तक अपनी हुनर का जलवा दिखा चुका है।
इसी कड़ी में एक नया नाम जुड़ गया है प्रियंका का। मधुबनी पेंटिंग कला के जरिए पहचान बना चुकी प्रियंका साड़ी व सिल्क के कपड़ों पर अपनी कला का जलवा बिखेर रही है। प्रियंका को बचपन से ही पेंटिंग कला के प्रति लगाव था।
मिथिला शैली में पेंटिंग करने की प्रेरणा उसे अपनी बुआ मीनाक्षी सिंह से मिली। ग्रामीण परिवेश होने के बावजूद प्रियंका की प्रतिभा निखरती रही। शिक्षक मिथिलेश कुमार सिंह व प्रतिमा देवी की पुत्री प्रियंका ने स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाली प्रदर्शनियों में अपनी कला के जरिए पहचान बनाने लगी। इन प्रदर्शनियों में उसकी कला को खूब सराहना मिली। वह अपनी पेंटिंग्स में पारंपरिक लोककथा के पात्रों व स्थानों को काफी खुबसूरती से इस्तेमाल करती है।
मिथिला की परंपरागत कोहबर, राम सीता विवाह, अल्पना व अन्य लोक कला से जुड़ी पेंटिंग बनाने के बाद प्रियंका अब साड़ियों व सिल्क के कपड़ों पर भी बखूबी कलाकारी कर रही है।
फाइन आर्ट के प्रशिक्षक सिंकु आनंद व योगेन्द्र योगी के निर्देशन में मधुबनी शैली में साड़ी पर पेंटिंग करने के लिए प्रियंका छह हजार रुपये तक लेती है। स्थानीय बाजार के अलावा साड़ी पर बनायी गयी पेंटिंग की डिमांड बड़े शहरों में भी है। ग्रामीण स्तर पर प्रारम्भिक शिक्षा के बाद वह फिलहाल पत्राचार से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर कर रही है और इंटरनेट से प्रतिभा को ज्यादा विस्तार दे रही है।




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